मौके पर मौजूद सिक्योरिटी ने और डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर रोहित प्राथमिक जाँच में मारपीट के आरोप से निर्दोष पाया गया. यूनिवर्सिटी की डॉक्टर अनुपमा राव और वाइस चांसलर आर.पी. शर्मा सर्जरी के एक दिन बाद 8 अगस्त को सुशील से अस्पताल में मिलने गए थे. डॉ. राव ने बताया कि उन्होंने सुशील कुमार से पहला सवाल यही किया था कि अगर पिटाई के बाद पेट में दर्द था तो वो 24 घंटे चलने वाले यूनिवर्सिटी के हेल्थ सेंटर क्यों नहीं गए. प्राइवेट अस्पताल की रिपोर्ट एपेन्डिसाइटिस बता रही है मारपीट नहीं. मामला तब तूल पकड़ता है जब ABVP छात्र नेता केन्द्रीय मंत्री से मिलते हैं , केन्द्रीय मंत्री शिक्षा मंत्री को इस मारपीट के बारे में पत्र लिखते हुए इन छात्रों को जातिवादी , देशद्रोही, आतंकवादी संबोधित करते हैं. उसके बाद स्मृति ईरानी ने छह हफ्ते में चांसलर को पांच चिट्ठियां लिखती हैं, चांसलर तत्परता दिखाते हुए इन 5 छात्रों को बिना किसी ठोस सबूत या जांच के होस्टल से निकाल फेंकते हैं. उसके परिवार का एकलौता आय स्त्रोत स्टाईपंड तो ७ महीनों से रुका ही था. उसके ऊपर कुछ ४० हज़ार का क़र्ज़ भी हो गया. होस्टल के सामने सड़क पर सोने वाले रोहित ने वी सी को एक आवेदन पत्र लिखा था , कि हर दलित छात्र को एडमिशन के समय थोडा ज़हर और एक अच्छी फांसी की रस्सी दी जाए पर सुशिल के एपेंडिक्स के लिए प्राइवेट अस्पताल जाने वाले यूनिवर्सिटी के ध्रतराष्ट्र कुछ देख नहीं पाते. जीवन के हर पथ पर ठोकर खाकर खुद को और अपने परिवार को सँभालने वाला रोहित इस बार न्याय की और इंसानियत की ओर नहीं देखता और खुद से भी न्याय नहीं कर पाता. फांसी चढ़ने से पहले वो हमारी मरी इंसानियत को आखिरी बार झंझोड़ता है. पर पैसे और ताकत से बनी दुनिया उसके पत्र में भी एक अपील नहीं खुद का बचाव ढूंढ निकालती है . रातों रात उसे आतंकवादी , जातिवादी , ढोंगी - दलित , याकूब समर्थक , नक्सली और गुण्डा बना दिया जाता है. आपने इसे पढ़ा है तो शायद आपको इस नक्सली की आत्महत्या के न्याय की उम्मीद होगी , मुझे नहीं है . हाँ , कुछ धरने प्रदर्शन होंगे और अनगिनत किसानों की तरह रोहित और उसकी आत्महत्या को भी भुला दिया जाएगा. रोहित ने सही कहा है "एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है. एक वोट तक. आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है. एक वस्तु मात्र. कभी भी एक आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका गया. " उसकी पहचान यही है , आपकी भी, मेरी भी. अगर आपको इंसानों में ये जाति , धर्म , राष्ट्र , भाषा , रंग आदि भेद का दोगलापन साफ़ नहीं दिख रहा या आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करते हैं तो मेरी आपसे विनती है, इंसानियत का दिखावा बंद करें ताकि मैं भविष्य में आपसे तर्क करने से पहले दस बार सोचूं. अगर रोहित पर कोई और आरोप लगाना बाकी हो तो आपका स्वागत है , ख़ुशी की बात है की अब आप और आपका समाज उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता.
by Aditya Chourasiya
January 20, 2016 at 01:21PM
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Tuesday, January 19, 2016
मौके पर मौजूद सिक्योरिटी ने और डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर रोहित प्राथमिक जाँच में मारपीट के आरोप से निर्दोष पाया गया. यूनिवर्सिटी की डॉक्टर अनुपमा राव और वाइस चांसलर आर.पी. शर्मा सर्जरी के एक दिन बाद 8 अगस्त को सुशील से अस्पताल में मिलने गए थे. डॉ. राव ने बताया कि उन्होंने सुशील कुमार से पहला सवाल यही किया था कि अगर पिटाई के बाद पेट में दर्द था तो वो 24 घंटे चलने वाले यूनिवर्सिटी के हेल्थ सेंटर क्यों नहीं गए. प्राइवेट अस्पताल की रिपोर्ट एपेन्डिसाइटिस बता रही है मारपीट नहीं. मामला तब तूल पकड़ता है जब ABVP छात्र नेता केन्द्रीय मंत्री से मिलते हैं , केन्द्रीय मंत्री शिक्षा मंत्री को इस मारपीट के बारे में पत्र लिखते हुए इन छात्रों को जातिवादी , देशद्रोही, आतंकवादी संबोधित करते हैं. उसके बाद स्मृति ईरानी ने छह हफ्ते में चांसलर को पांच चिट्ठियां लिखती हैं, चांसलर तत्परता दिखाते हुए इन 5 छात्रों को बिना किसी ठोस सबूत या जांच के होस्टल से निकाल फेंकते हैं. उसके परिवार का एकलौता आय स्त्रोत स्टाईपंड तो ७ महीनों से रुका ही था. उसके ऊपर कुछ ४० हज़ार का क़र्ज़ भी हो गया. होस्टल के सामने सड़क पर सोने वाले रोहित ने वी सी को एक आवेदन पत्र लिखा था , कि हर दलित छात्र को एडमिशन के समय थोडा ज़हर और एक अच्छी फांसी की रस्सी दी जाए पर सुशिल के एपेंडिक्स के लिए प्राइवेट अस्पताल जाने वाले यूनिवर्सिटी के ध्रतराष्ट्र कुछ देख नहीं पाते. जीवन के हर पथ पर ठोकर खाकर खुद को और अपने परिवार को सँभालने वाला रोहित इस बार न्याय की और इंसानियत की ओर नहीं देखता और खुद से भी न्याय नहीं कर पाता. फांसी चढ़ने से पहले वो हमारी मरी इंसानियत को आखिरी बार झंझोड़ता है. पर पैसे और ताकत से बनी दुनिया उसके पत्र में भी एक अपील नहीं खुद का बचाव ढूंढ निकालती है . रातों रात उसे आतंकवादी , जातिवादी , ढोंगी - दलित , याकूब समर्थक , नक्सली और गुण्डा बना दिया जाता है. आपने इसे पढ़ा है तो शायद आपको इस नक्सली की आत्महत्या के न्याय की उम्मीद होगी , मुझे नहीं है . हाँ , कुछ धरने प्रदर्शन होंगे और अनगिनत किसानों की तरह रोहित और उसकी आत्महत्या को भी भुला दिया जाएगा. रोहित ने सही कहा है "एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है. एक वोट तक. आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है. एक वस्तु मात्र. कभी भी एक आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका गया. " उसकी पहचान यही है , आपकी भी, मेरी भी. अगर आपको इंसानों में ये जाति , धर्म , राष्ट्र , भाषा , रंग आदि भेद का दोगलापन साफ़ नहीं दिख रहा या आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करते हैं तो मेरी आपसे विनती है, इंसानियत का दिखावा बंद करें ताकि मैं भविष्य में आपसे तर्क करने से पहले दस बार सोचूं. अगर रोहित पर कोई और आरोप लगाना बाकी हो तो आपका स्वागत है , ख़ुशी की बात है की अब आप और आपका समाज उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. January 20, 2016 at 01:21PM
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